Essay On Pariksha Ka Bhay In Hindi

 

बच्चों को बहुत तनाव उस वक्त होता है जब उनकी परीक्षा सिर पर आती है। परीक्षा के पहले ढेर सारी पढाई और याद करने का काम उनके लिए किसी मुसीबत से कम नही होता है। ये सिर्फ उनकी समस्या नही होती है जिनको परीक्षा देनी है बल्कि ये परिवार के लिए भी तनाव का कारण होता है। ये तनावपूर्ण माहौल परीक्षा देने के बाद खत्म नही होता है बल्कि परिणाम आने तक चलता है।

इस माहौल में बच्चों को माता -पिता अच्छी तरीके से मदद कर सकते हैं। यहां कुछ सुझाव हैं जिनको ध्यान में रखकर बच्चे के लिए उनकी परीक्षा आसान बनायी जा सकती है।

तैयारी करें

अच्छी तरीके से प्लान बनाएं और बच्चों के पढने का समय निर्धारित करें। इसमें इस बात को शाामिल करें कि बच्चे को ब्रेक भी मिले ताकि वो खुद को तरोताज़ा महसूस करा सकें। उनसे ये जानें कि सबसे मुश्किल विषय उनके लिए कौन सा है फिर उसपर खुद भी ध्यान दें और आसान बनाने में उनकी मदद करें।

आरामदाय हो जगह

पढ़ने के लिए बच्चे के पास आरामदायक जगह होनी चाहिए जहां पर उनको टीवी, लैपटॉप, आदि का शोर न सुनाई दे। अगर बच्चे का बैठना का तरीका सही नही है तो उनको गरदन में दर्द, सिर में दर्द और पीठ में दर्द हो सकता है। इसलिए उनको सही तरीके से बैठना भी सिखाएं। इसके अलावा उनकी कुर्सी आरामदायक हो और उनके पीठ को सपोर्ट करने वाली हो। स्डटी टेबल की उंचाई भी सही हो, उनको बहुत झुकने की जरूरत नही होनी चाहिए। कभी बेड पर या सोफे पर  पढने की आदत न पड़ने दें, इससे उनको मांसपेशियों में खिचाव और थकान आ सकती  है।

स्वस्थ आहार

पढाई में व्यस्त होने के कारण  कई बच्चे समय पर खाना नही खाते हैं साथ ही कुछ को खाना खाना ही पसंद नही होता है। ऐसे में कई बार पढाई के दौरान भी ये आदते वो दोहराते हैं। जब बच्चों को भूख लगी होती है तो पढाई में मन नही लगता है। इसके साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि बच्चा समय पर खाना खा रहा है। इस दौरान उनको सही मात्रा में पौष्टिक आहार मिलना चाहिए ताकि उनका दिमाग सही तरीके से काम करे।

अच्छी नींद

अच्छी नींद से दिमाग तेज होता है और ध्यान लगाने में मदद मिलती है। परीक्षा के दौरान देर रात तक जगना और पढना अच्छी आदत नही है। इस बात का ख्याल रखें कि बच्चा  रोजाना सात से आठ घंटे की नींद जरूर ले रहा है। बच्चे के लिए अच्छी नींद उनको अनेको फायदा पहंुचा सकती  है।

स्थिति के अनुसार बदलें

अगर बच्चा पढने में मन लगा रहा है तो उसे  कुछ काम में मदद करें जैसे उसका कमरा सही करना, कपड़े बदलने में मदद, सही जगह पर सामान रखना। इससे बच्चे को बाकी चीजों के लिए चिंतित होने की जरूरत नही होगी।

उनसे बात करें

उनसे बात करना बहुत जरूरी है। समय निकालकर उनसे बात करें और उनको समझने की कोशिश करें। उनको ये भी समझाएं कि परीक्षा के दौरान घबराहट और व्याग्रता आम बात है। उनको बताएं कि हर कोई इस दौर से जाता है इसलिए खुद को तैयार रखना जरूरी है।

शारीरिक गतिविधि को बढावा दें

ये अच्छी बात नही है कि परीक्षा के दौरान खेल पर पूरी  पाबंदी लगा दी जाए। शारीरिक गतिविधि से बच्चे के दिमाग को आराम मिलता है, तनाव कम होता है और आंतरिक शक्ति बढती है। इसलिए हमेशा कुछ शारीरिक गतिविधि करने दें। भले ही वो परीक्षा का वक्त ही क्यों न हो।

तनाव को रखें दूर

बच्चे को उसकी पुराने बुरे प्रदर्शन के बारे में याद दिलाने का ये सही वक्त नहीं है। इससे वो अपना आत्मविश्वास खो सकते हैं और परीक्षा के पहले उन्हें घबराहट हो सकती है। हमेशा सकारात्मक रहें और जब भी वो परीक्षा के लिए जाएं उनका आत्मविश्वास बढाने की कोशिश करें। बच्चे की क्षमता को जानें और सार्थक लक्ष्य निर्धारित करें।

असफलता को भी स्वीकारना सिखाएं

बच्चों की असफलता या एग्जाम में ख़राब नम्बर आने से निराश न हों और न ही अपनी उदासी व्यक्त करें ।उनको बताएं कि असफलता का मलतब ये नहीं होता है कि अब आपका जीवन खत्म हो गया है । बल्कि असफलता भी सीखने का एक हिस्सा है। इसके साथ ही उनकी असफलता के लिए कभी भी उनका मज़ाक न उड़ाएं और न ही उनको ताना मारें., इसके बजाय आगे के लिए  उनको प्रोत्साहित करें।

कोई तोहफा भी दें

परीक्षा के खत्म होने के बाद फिर से एक नई  शुरुआत होती है। परीक्षा के दौरान आप और आपका बच्चा दोनों तनावपूर्ण माहौल में थे। इसलिए जरूरी है कि थोड़ा रिलैक्स भी करें इसलिए इस मौके के बाद सेलीब्रेशन करना न भूूलें। उनके मेहनत के लिए उनको कुछ तोहफा भी ज़रूर  दें।

याद रखें कि बच्चे को हमेशा ये लगना चाहिए कि आप उसे प्यार करते हैं और वो आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसा बिल्कुल नही है कि आप सिर्फ उसके परीक्षा के नंबर से प्यार करते हैं।

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  • EXAM STRESS : NATURAL FEELING LEARN TO DEAL WITH IT*. http://www.cbse.nic.in/examstress.htm. Accessed on 1stSep 2016
  • Exam stress. http://www.familylives.org.uk/advice/teenagers/school-learning/exam-stress/. Accessed on 1st Sep 2016

परीक्षा कैसी भी हो और किसी की भी हो, परीक्षा परीक्षा होती है । यह परीक्षा के दिन अन्य दिन के मुकाबले किस तरह भारी पड़ते हैं, यह वही अच्छी तरह समझ सकता है, जो परीक्षा के दौर से गुजर रहा होता है । हर आदमी को जिंदगी में कई बार परीक्षा के कठिन दौरों से गुजरना ही पड़ता है। अब इन कठिन घड़ियों से कोई आदमी चाहे रो-धोकर पार पा ले या हँसी-ख़ुशी गले लगाकर, यह सब सबकी अपनी-अपनी प्रकृति और क्षमता पर निर्भर करता है।


जिंदगी में आने वाली परीक्षाओं के दौर से गुजरते हुए जब बात छोटे बच्चों के परीक्षा के दिनों पर आकर अटकती हैं तो यह मेरे हिसाब से किसी भी माँ-बाप के लिए बच्चों की परीक्षा से ज्यादा उनकी परीक्षा के दिन होते हैं, जब बच्चों को पढ़ाने-रटाने की माथापच्ची में उलझे कच्चा-पक्का खाकर दिन का चैन और रातों की नींद उड़ाने का समय आन पड़ता है। आजकल ऐसे ही परीक्षा के कठिन दिन शुरू हो चुके हैं। एक तो बच्चों की परीक्षा शुरू हुई नहीं कि सर्दी-जुकाम के साथ बुखार ने उन्हें आ घेरा, जिससे नई मुसीबत गले पड़ गई। अक्सर ऐसे कई मौकों पर यह सब देख-देखकर अब मन ने हैरान-परेशान होना प्राय: छोड़ सा दिया है, फिर भी माँ का दिल कहाँ मानता है। बच्चों की स्कूली गाडी बिना ब्रेक लगे फुल स्पीड से आगे बढ़े यही सोचकर ऑफिस से छुट्टी लेकर कमर कसकर लगी हुई हूँ। पढ़ाते-रटाते समझ में आ रहा है कि क्यों बचपन में कभी परीक्षा के दिनों में अच्छे खासे शांत घर में भूचाल आ जाता था।


बच्चे जब बड़े होकर समझदार हो जाते हैं तो उनमें परीक्षा की समझ विकसित हो जाती है, तब माँ-बाप को उनके खाने-पीने और समय पर आराम करने का ध्यान खुद रखना पड़ता है, वर्ना वे रात भर चाय-कॉफ़ी-बिस्कुट बना-खाकर खटपिट-खटपिट कर सबकी नींद उडाये रखते हैं। इसके उलट छोटे-छोटे बच्चों को पढाना-रटाना बहुत टेढ़ी खीर है, जो किसी कठिन अबूझ पहेली से कमतर नहीं आंकी जा सकती है। अधिकांश शरारती बच्चों की तरह मेरे दोनों बच्चे भी कम शरारती नहीं, खेलने, टीवी पर कार्टून देखते समय तो थोडा बहुत लड़ेंगे-भिड़ेंगे लेकिन पढने के नाम पर एक साथ क्या बिठा लिया तो आंख हटी नहीं कि उनकी खुसुर-फुसुर के साथ लाता-लूती या बैठे-बैठे ऊँघने-सोने का उत्क्रम शुरू हो जाएगा और फिर चल पड़ेगा एक-दूसरे की शिकायत का सिलसिला - "मैं नहीं, वह तो यह .... मैं तो वह .." माजरा समझकर जरा चिल्ला-पों मचाई नहीं कि बात-बात पर उनके पित्त गरम हो जाने लगते हैं। ऐसे हालातों में फिर तो गर्दन पकड़कर पढवाना मजबूरी बन जाती है, पेच हाथ में रखकर पत्थर की नाव चलाने की कोशिश करनी ही पड़ती है।





सिर से परीक्षा के इन दिनों का बोझ जल्दी से उतर जाय इसका बच्चों के साथ मुझे तो बेसब्री से इंतजार है ही साथ ही छोटे कार्तिकेय को भी कम इंतज़ार नहीं करना पड़ रहा है। यह इंतज़ार उसकी मासूम आँखों में साफ़ झलकता है। वह नानी की गोद में गुमसुम टुकुर-टुकुर अपनी पढ़ाई-लिखाई में व्यस्त दीदी-भैया की इस बेरुखी का सबब समझने की पूरी कोशिश में लगा रहता है। वह समझ नहीं पा रहा है कि आखिर आजकल स्कूल से आते ही टी-वी. पर कार्टून और खेलना-खिलाना छोड़-छोड़कर दोनों कौन से जंग जीतने की तैयारी में जुते हुए हैं। उस मासूम को अभी कुछ खबर नहीं लेकिन दीदी-भैया को इसकी जरुर खबर है कि जब स्कूल में पेपर के बण्डल से उनका पेपर बाहर निकलकर खुली हवा में साँस लेता है तो किस तरह उनकी जान सांसत में डालकर सिट्टी-पिट्टी गोल कर देता है

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